Swami Vivekananda Jayanti Jan 12, 2025: स्वामी विवेकानंद जयंती है आज (12 जनवरी)

स्वामी विवेकानन्दकी शिवभक्ति

(स्वामी श्रीविदेहात्मानन्दजी )

स्वामी विवेकानन्द इस युगके परम ज्ञानी आचार्य थे और उनके जीवनचरितका विहंगावलोकन करनेपर यह देखनेमें आता है कि उनके जीवनका प्रारम्भ ही शिवकृपासे हुआ, युवावस्थामें उन्हें शिवसे ही कर्मकी प्रेरणा मिली और अन्तमें शिवानुभूतिके साथ ही उनके जीवनका पटाक्षेप हुआ । उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकताके एक सुप्रसिद्ध वकील थे | माता भुवनेश्वरी देवीको कई संतानें हुई, परंतु उनमेंसे कइयोंका शैशवकालमें ही निधन हो गया, बच रही थीं तो केवल पुत्रियाँ । पुत्र-प्राप्तिके लिये उनकी माता प्रतिदिन अपने आराध्य देवाधिदेव महादेवकी पूजा, ध्यान-प्रार्थना, व्रत आदिमें निरत रहने लगीं । काशीमें निवास करनेवाली अपने परिवारकी एक वृद्धाको भी उन्होंने वहाँके वीरेश्वर शिवके मन्दिरमें इस निमित्त पूजा, दान आदिकी व्यवस्था करनेका अनुरोध किया। तदनुसार वे वृद्ध महिला भी वाराणसीमें शिवकी अर्चना करने लगीं।

भगवान्‌ शिवकी कृपासे एक दिन उन्हे पुत्र-प्राप्तिका पूर्वाभास मिला । उस दिन वे पूजा, प्रार्थना आदिसे निवृत्त होकर रातमें शयन कर रही थीं, सहसा उन्होंने देखा कि जटाजूटमण्डित, ज्योतिर्मय, तुषारधवल महादेव उनके सामने स्थित हैं और क्षणमें ही देवाधिदेव महादेवने एक नन्हैसे शिशुका रूप धारण कर लिया। उस रजतगिरिके समान सुकुमार शिशुका दर्शन करते ही उनकी नींद खुल गयी । उनका मन एक अपूर्व आनन्दसे भर गया । वे सोचने लगी कि यह मात्र एक स्वप्न था या फिर भावीका पूर्वाभास |

इस अलौकिक स्वप्नके कुछ महीनों बाद ही १२ जनवरी, १८६३ ई०, मकर-संक्रान्तिके दिन उन्हें पुत्ररत्नकी प्राप्ति हुई वीरेश्वर शिवकी आराधनाके फलस्वरूप ही जन्म होनेके कारण माने उस शिशुको ‘वीरेश्वर’ नाम दिया और दुलारमें उसे ‘बिले’ कहकर सम्बोधित करने लगीं। स्कूलमें उनका नाम हुआ नरेन्द्रनाथ दत्त और परवर्ती कालमें स्वामी विवेकानन्दके रूपमें विख्यात हुए। बचपनकी क्रीडाओंमें जब “बिले’ किसी प्रकार न मानते तो मा उन्हें शिव – शिव इस प्रकार पुकारती तो वे शान्त हो जाते। फिर कुछ बड़े होनेपर माताके ही परामर्शसे ‘बिले’ शिवजीकी मूर्ति पाकर उनकी पूजा-अर्चना तथा ध्यान करने लगे। बालक बिले गेरुए वस्त्र का एक टुकड़ा कौपीनकी भाँति कमरमें खोंसकर घरमे घूम रहे थे, यह देखकर माने कहा– यह क्या है रे !’ बिलेने जोरकी आवाजमें उल्लासपूर्वक कहा -मा ! मैं शिव बन गया हूँ।’

धीरे-धीरे वे बढ़ते गये। युवावस्थामें उनके मनमें कभी-कभी यह प्रश्‍न उठने लगा कि क्या वास्तवमें ईश्वरका अस्तित्व है और क्या उनका दर्शन भी किया जा सकता है ? इस प्रश्नको लेकर वे दक्षिणेश्वर पहुँचे और इसका समाधान पाकर उन्होंने पूर्णतः शिव-भक्तिकी सत्ताको स्वीकार कर लिया।

अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्णजीकी महासमाधिके पश्चात्‌ वे कलकत्ताके ही वराहनगर अञ्चलमें एक मठ बनाकर अपने गुरुभाइयोंके साथ उसमें निवास करने लगे । वहाँ श्रीरामकृष्णके अस्थि-अवशेष तथा पटकी स्थापना कर उन लोगोंने एक देवालय बनाया था। संध्याको आरतीके समय वे लोग एक साथ मिलकर यह पद गाया करते थे-

जय शिव ओंकारा भज शिव ओंकारा |

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव हर हर हर महादेव ॥

स्वामीजीने शिवजीपर एक भजनकी रचना भी की थी, जो इस प्रकार है-

ताथैया ताथैया नाचे भोला, बम बम बाजे गाल।

डिमि डिमि डिमि डमरु बाजे, दुलिछे कपाल माल ॥

गरजे गंगा जटा माझे, उगरे अनल त्रिशूल राजे।

धक धक धक मौलिबन्ध, ज्वले शशांक भाल ॥

इस भजनको गाते समय स्वामीजी अपने गुरुभाइयोंके साथ मिलकर नृत्य भी करते थे।

कुछ वर्षोके मठ-जीवनके दौरान उन्होंने कई बार वाराणसी तथा वैद्यनाथधाम आदि स्थानोंमें जाकर तपस्या की | तत्पश्चात्‌ वे परिव्राजकके रूपमें पश्चिमी भारतकी यात्रापर निकले | रामेश्वरम्‌ पहुँचकर महादेवका दर्शन करना भी उन्होंने अपना लक्ष्य बना रखा था, ऐसा उनके कई पत्रोंसे ज्ञात होता है।

स्वामीजीने विशववासियोंको समझाया कि हिन्दू लोग सभी धर्मोंको सत्य तथा ईश्वरतक पहुँचनेका एक-एक पथ मानते हैं। शिकागो धर्ममहासभाके समक्ष हिन्दू-धर्मका परिचय देते हुए उन्होने ‘शिवमहिम्नःस्तोत्र‘का निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया था-

रूचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥

अर्थात्‌ ‘जैसे विभिन्न नदियाँ एक ही समुद्रमें पहुँच जाती हैं, उसी प्रकार रुचिवैचित्र्यके अनुसार सीधे अथवा टेढ़े-मेढ़े मार्गोंसे आनेवाले सभी लोग, हे प्रभो ! अन्ततः तुम्हींमें आकर मिल जाते हैं ।’

विदेश-यात्रासे लोटकर जब वे पुनः रामेश्वरम्‌ शिवका दर्शन करने आये तो अपने एक व्याख्य़ानमें स्वामीजीने कहा था–“” प्रत्येक प्राणीके हृदयमें शिवका वास है, परंतु उसपर एक आवरण-सा पड़ा हुआ है । अभावग्रस्त लोगोंकी सेवाके द्वारा जब तुम्हारा चित्त शुद्ध हो जायगा, तो शिवजी स्वयं ही प्रकट होंगे । जो व्यक्ति जितना ही निःस्वार्थ है, वह शिवजीके उतना ही समीप है।’ ‘शिवभावसे जीवसेवा’ यही स्वामीजीके संदेशका केन्द्रबिन्दु है।

उन्होंने उत्तरी भारत, हिमालय और विशेषकर अमरनाथ आदि शैव क्षेत्रोंकी पावन यात्रा भी की | हिमालयके दर्शनकर उनका मन शिवजीके भावमें विभोर रहा करता था | महादेवके प्रति उनमें असीम प्रेम था। उनका कहना था कि “महादेव शान्त, सुन्दर तथा मौन हैं और मैं उनका भक्त हूँ।’ वे श्वेतकाय हिममण्डित हिमालयकी पर्वत-श्रेणियोंको शिव और उनके ऊपर पड़नेवाले आलोकको जगदम्बारूपमें बताते थे। इस प्रकार सम्पूर्ण हिमालय ही स्वामीजीके लिये मानो महादेवकी एक जीवन्त प्रतिमा थी।
अमरनाथ तीर्थकी यात्राके बाद उन्होंने बताया कि अमरनाथसे उन्हें इच्छा-मृत्युका वर मिला है। इस दर्शनका प्रभाव उनपर इतना गम्भीर हुआ था कि वे उन दिनों सर्वदा शिवजीके भावमें ही विभोर रहते तथा उनके मुखसे उन्हींकी महिमाका गान होता रहता था।
पाश्चात्त्य देशोंसे लौटनेके बाद फरवरी १९०२ ई० में स्वामीजीने अन्तिम बार वाराणसीकी यात्रा की | वहाँ प्रतिदिन स्वामीजी विश्वनाथ तथा अन्नपूर्णकि दर्शनको जाया करते थे । स्वामीजीने छः श्लोकोंमें एक अत्यन्त मनोरम “शिवस्तोत्र” की रचना की है । शिवके भजन उन्हें अत्यन्त प्रिय थे । उन्हींके द्वारा रचित एक शिवस्तुतिके साथ इस प्रकरणको पूर्ण किया जा रहा है-

हर हर हर भूतनाथ पशुपति
योगेश्वर महादेव शिव पिनाकपाणि।
ऊर्ध्व ज्वलत जटा-जाल, नाचत व्योमकेश भाल,
सप्तभुवन धरत ताल, टलमल अवनी॥

[कल्याण (हिन्दी मासिक ) जनवरी १९९३ से उद्धृत)]- Retyped, Pardon typos.


Discourse by Vidhya Srinivasan, on Swami Vivekananda’s Divya Charithram, done in one of the monthly Satsangams in 2019


 

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